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गुरु

मानव सृष्टि की सबसे उन्नत संरचना है ,जिससे परमपिता के इस धरा को आकर्षक एवं लक्ष्य उन्मुख बनाया है | मानव में सर्वोच्च आत्मा और मन है ,मानव को आत्मा का भान एक नियत स्तर से ऊपर उठने पर होता है किंतु मन साधारण अवस्था में भी ज्ञात हो जाता है | मन का विकास और नियंत्रण ही मानव को उसके सर्वोच्च आदर्श तक पहुंचाता है | मन का विकास बुद्धि को सहायता प्रदान करता है, ताकि व्यक्ति प्रकृति के साथ समायोजित हो सके | महान साधकों ने भी मन को नियंत्रित कर स्वयं को परमपिता के समीप पाया है, जिसका प्रमाण हमें इतिहास के पन्नों पर आसानी से मिल जाता है | वर्तमान में अक्सर देखता हूं शब्दों और कर्म में संघर्ष, शक्तियों के लिए संघर्ष, मन की जैसी गहराई से बातें कहीं और लिखी जाती,  क्या उसी गहराई से इसे समझा जाता है ? अक्सर यह उत्तर नकारात्मक में बनता है, अगर बोलने या लिखने वाले की गहराई सुनने या पढ़ने वाले की गहराई में शाम में हो जाए तो सारी समस्या का समाधान बजा आधी से अधिक समस्याएं तो इसी बात के कारण बनती है गुरु नानक विवेकानंद महावीर के कथन जो सोता सुलभ है अगर उसी गहराई से समझ ली जाए जिस गहराई से बोली गई हैं अथवा लिखी गई हो तमाना मन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचकर एक नहीं नई पहचान स्थापित कर लेना वर्तमान परिवेश में मन की गहराई को विकसित करना है शिक्षा का परम उद्देश्य है मानव मन की गहराई शिक्षा के माध्यम से ही पाई जा सकती किंतु विडंबना है सही शब्द और वाक्य के संघर्ष को शिक्षा ही बलवती कर रही क्योंकि वर्तमान शिक्षा अपने इस अवस्था में है कि मन की गहराई मात्र से चले स्तर तक हो सकती सवाल यह उठता है यह बोलने और सुनने वाले लिखने और पढ़ने वाले के मध्य शाम में कैसे स्थापित किया जा सकता क्या यह व्यवहारिक रूप से सम्भव  करने में कौन-कौन से तंत्रों की आवश्यकता होगी क्या इन तंत्रों का विसर्जन करना होगा और अगर हां तो इसका बुरा था कौन होगा यह सारी जिम्मेवारी सम्मिलित रूप से पूरे समाज को उठानी होगी जिसकी पौधा ज्ञान प्रदान करने वाले केंद्रों के शिक्षक नहीं अपितु गुरु और और पवित्रता से भरपुर सागर की परिसीमा रखने वाले गुरु जिसका चुनाव  दुष्कर है अरे ऐसा इसलिए है की वर्तमान अवस्था में स्वामी रामकृष्ण परमहंस बनना  कोई नहीं चाहता लेकिन विवेकानंद की अपेक्षा हर कोई रखता है .

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